Wednesday, May 13, 2009

मसूर

मसूर

मसूर का दलहनी फसल के रूप में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। मध्‍यप्रदेश में इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख हेक्‍टेयर है। राज्‍य में चने के बाद मसूर का क्षेत्रफल एवं उत्‍पादन दोनों में दूसरा स्‍थान है। बारानी क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। अच्‍छे बाजार भाव और अधिक उपज मिलने से कृषक इसे सिंचित क्षेत्र में भी ले रहे हैं। दाल के लिये उपयोग के अतिरिक्‍त कई प्रकार के व्‍यंजनों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
मध्‍यप्रदेश में मुख्‍य रूप से विदिशा, सागर, रायसेन, दमोह, जबलपुर, सतना, पन्‍ना, रीवा, नरसिंहपुर, सीहोर, ग्‍वालियर एवं भिण्‍ड आदि जिलों में इसकी खेती की जाती है।
भूमि: मसूर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, किंतु दुमट और भारी भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्‍त है। भूमि का पीएच मान 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिये तथा खेत में जल निकास का भी अच्‍छा प्रबंध होना चाहिये अन्‍यथा फसल की बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
भूमि की तैयारी: भूमि के तैयारी के लिये खेत की पहले एक बार हल्‍की जुताई कर बखनी करें तथा पाटा चलाकर भूमि को समतल करें जिससे नमी संरक्षित रहे। समतल खेत में बुआई से बीज एक समान गहराई पर गिरता है। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है।
उन्‍नत किस्‍में: प्रदेश में उन्‍नत किस्‍मों का फैलाव हो रहा है। स्‍थानीय जातियों की तुलना में अधिक उपज तथा रोग प्रकोप में कमी के कारण उन्‍नत जातियॉं कृषकों द्वारा अपनाई जा रही हैं। उन्‍नत किस्‍मों का विवरण निम्‍नानुसार है:-
1. के-75 (मल्लिका): यह जाति 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 10-12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना छोटा होता है, जिसके 100 दानों का वजन 2.6 ग्राम है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र अर्थात सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिये उपयुक्‍त है।
2. जे.एल.-1: इस जाति की पकने की अवधि 112-118 दिन है तथा औसत उपज 11-13 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है तथा 100 दानों का वजन 2.8 ग्राम होता है। यह जाति भी संपूर्ण विश्‍व क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
3.एल-4076: यह जाति 115-125 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। यह उकठा रोग निरोधक है। इसका दाना अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता है। 100 दानों का वजन 3.0 ग्राम होता है। यह जाति प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिये उपयुक्‍त है।
4. जे.एल.-3: मध्‍यम अवधि की नई विकसित यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा 14-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देती है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है। इसके 100 दानों का वजन लगभग 3.0 ग्राम होता है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
5. आई.पी.एल.-18 (नूरी): यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा औसत उत्‍पादन 12-14 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। मध्‍यम आकार के दानों वाली इस जाति का वजन 3.0 ग्राम है।
6. एल. 9-2: देरी से पकने वाली यह किस्‍म 135-140 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसके दाने छोटे आकार के होते हैं। यह जाति भिण्‍ड तथा ग्‍वालियर क्षेत्रों के लिये अधिक उपयुक्‍त है।
बीज की मात्रा एवं बोने की विधि: सामान्‍यत: 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर क्षेत्र में बोनी के लिये पर्याप्‍त होता है। बीज का आकार छोटा होने पर यह मात्रा 35 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर होनी चाहिये। सामान्‍य समय में बुवाई के लिये कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. रखना चाहिये। देरी से बुवाई के लिये कतारों की दूरी कम कर 20-25 सेमी. कर देना चाहिए। बुवाई नारी या सीडड्रिल से 5-6 मी. की नमी युक्‍त गहराई पर करना चाहिये।
बीजोपचार: मसूर की फसल को विभिन्‍न बीज जनित रोगों विशेषकर उकठा रोग से बचाने के लिये बीज को उपचारित करके बोना आवश्‍यक है। थाइरम 2 ग्राम तथा 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम दवा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें। बीज उपचार करने के यंत्र से बीज उपचारित करें। इसके बाद बीज को 5 ग्राम राइजोबियम कल्‍चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. क्‍ल्‍चर से उपचारित कर बोना चाहिये। फफूंद नाशक से उपचारित करने के बाद दोनों कल्‍चर को बीज में मिलाकर थोड़ा पानी छिड़क कर हाथ से अच्‍छी तरह मिलाएं। बीज को थोड़ी देर छाया में सुखा कर बोनी शीघ्रता से पूरी करें।
बुवाई का समय: असिंचित अवस्‍था में नमीं उपलब्‍ध रहने पर अक्‍टूबर के प्रथम सप्‍ताह से नवम्‍बर के प्रथम सप्‍ताह तक मसूर की बोनी करनी चा‍हिये। मसूर की सिंचित अवस्‍था में बोनी मध्‍य अक्‍टूबर से मध्‍य नवम्‍बर तक की जा सकती है। नवम्‍बर के अंतिम सप्‍ताह के बाद बोनी करने से पकने की अवस्‍था में तापक्रम बढ़ने से फसल समय से पूर्व पकने लगती है तथा दाना छोटा पड़ जाता है और उपज में कमी आती है।
खाद एवं उर्वरक: सिंचित फसल के लिये 20-25 किलोग्राम नत्रजन तथा 50 किलोग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टेयर उपयोग करना चाहिए। असिंचित फसल के लिये 15-20 किलोग्राम नत्रजन एवं 30-40 किलोग्राम स्‍फुर का उपयोग प्रति हेक्‍टेयर करना चाहिये। भूमि में पोटाश की कमी होने पर बुवाई के समय 20 किलोग्राम पोटाश देना चाहिये। 5-6 टन प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट खाद अवश्‍य देना चाहिये।
सिंचाई: सामान्‍यत: मसूर बरानी फसल के रूप में ली जाती है। यदि सिंचाई उपलब्‍ध है तो खेत में पलेवा देकर बुवाई करना चाहिये। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है। सामान्‍यत: बाद में सिंचाई की आवश्‍यकता नहीं होती है। सिंचाई उपलब्‍ध होने पर फूल आने के पूर्व एक हल्‍की सिंचाई करना चा‍हिये। इससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।
निंदाई-गुड़ाई: मसूर की फसल में 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिये। खेत में नींदा उगने पर हैंड हो या डोरा चलाना चाहिये इससे खरपतवार नियंत्रण होगा तथा वायु संचार के लिये गुड़ाई भी हो जाती है। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण्‍ के लिये बुवाई पूर्व फ्लूक्‍लोरोलीन 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
पौध संरक्षण:
(अ) कीट: मसूर में माहों, थ्रिप्‍स तथा फली छेदक इल्‍ली कीटों का प्रकोप होता है। माहो एवं थ्रिप्‍स के नियंत्रण के लिये मोनोक्रोटोफास एक मि.ली. प्र‍ति लीटर पानी या मेटासिस्‍टाक्‍स 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। फल छेदक इल्‍ली के लिए इण्‍डोसल्‍फान 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्विनालफास एक मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रित हो जाते हैं। खेत में छिड़काव एक समान होना चाहिए।
(ब) रोग: मसूर में मुख्‍य रूप से उकठा तथा गेरूआ रोग का प्रकोप होता है। उकठा रोग की उग्रता को कम करने हेतु थायरम (3 ग्राम प्रति किलोग्रामे या थायरम 1.5 ग्राम + कार्बन्‍डाजिम 1.5 ग्राम का मिश्रण प्रति किलोग्राम) से बीजोपचार कर बोयें। उकठा निरोधक जैसे जे.एल.-3 आदि बोयें। कभी-कभी गेरूआ रोग का भी प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिये डायथेन एम 45, 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए। गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों में एल 4076 आदि गेरूआ निरोधक जातियॉं बोयें।
कटाई एवं गहाई: फसल पकने की अवस्‍था में पीली पड़ कर सूखने लगती हैं। फसल की कटाई कर खलिहान में बैलों या ट्रेक्‍टर से गहाई कर पंखे से सफाई करें। बीज को सुखाकर भंडारण करें।

चना

चना
चना मध्‍य प्रदेश की एक महत्‍वपूर्ण दलहनी फसल है। प्रदेश में देशी, काबुली और गुलाबी चना की फसल सफलतापूर्वक ली जाती है। प्रदेश में लगभग 28.50 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में चने की फसल ली जाती है तथा उत्‍पादन लगभग 24.76 लाख टन है। इस प्रकार मध्‍यप्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक चना उत्‍पादन वाला प्रदेश है। प्रदेश की औसत उपज लगभग 900 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर ही है इसलिए चना उत्‍पादन की उन्‍नत तकनीक को अपनाना आवश्‍यक है।
भूमि का चुनाव एवं खेत की तैयारी: चना फसल के लिए सबसे उपयुक्‍त मध्‍यम से भारी भूमि होती है। भूमि का पी.एच.मान 5.6 से 8.6 के बीच होता होना चाहिए। हल्‍की भूमि में चना फसल लेने की बाध्‍यता होने पर उसमें गोबर की खाद या हरी खाद का आवश्‍यक रूप से उपयोग करना चाहिए जिससे भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाए।
जिन खेतों में खरीफ फसल नहीं ली गई हो, दो बार आड़ा एवं खड़ा बखर चलाकर नमी को संरक्षित करें। जहां खरीफ फसल ली गई है वहां फसल की कटाई के तुरंत बाद पहले दिन एक बखर चलाकर दूसरे दिन उसके विपरीत दिशा में दूसरी बार पाटा सहित बखर चलाएं और खेत को बोने के लिए तैयार करें। खरीफ फसलों के अवशेषों को खेत से बाहर निकालें।
उन्‍नत किस्‍में: चने की उन्‍नत किस्‍मों का चुनाव भूमि के प्रकार, सिंचाई जल की उपलब्‍धता व पिछले वर्षो में रोगों के प्रकोप की स्थिति आदि को ध्‍यान में रखकर ही करें। विभिन्‍न जातियों का प्रमाणित बीज ही प्रयुक्‍त करें। चने की संस्‍तुत किस्‍मों का विवरण तालिका में दिया गया है।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार: चने की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए पौधों की संख्‍या तीन से साढ़े तीन लाख/हेक्‍टेयर होनी चाहिए। इसके लिए प्रति वर्गमीटर 30 से 35 पौधे होना चाहिये। सामान्‍य रूप से इस पौध संख्‍या को प्राप्‍त करने के लिए 75 से 100 किलोग्राम बीज/हेक्‍टेयर की आवश्‍यकता किस्‍मों के बीज आकार के अनुसार होती है। कतारों से कतारों की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखकर वांछित पौध संख्‍या प्राप्‍त की जा सकती है।
बुवाई के पूर्व बीज को फफूंदनाशक दवा से अवश्‍य उपचारित करें। थायरम 2 ग्राम तथा कार्बेन्‍डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। इसके बाद बीज को राइजोबियम तथा पीएचबी कल्‍चर से 5 ग्राम प्रत्‍येक को प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें और उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बोआई करें। राइजोबियम कल्‍चर जे.पी.एस 65 का उपयोग लाभप्रद पाया गया है।
बोने का समय: सामान्‍य बोनी का समय 15 अक्‍टूबर से 15 नवम्‍बर तक है। सिंचित क्षेत्रों में नवंबर अन्‍त तक बोआई कर सकते हैं। देर से बोनी की स्थिति में उपयुक्‍त जाति का चयन करें तथा दिसंबर के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करें।
खाद एवं उर्वरक: मिटटी परीक्षण के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। चने की फसल को सामान्‍यत: 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन, 45–50 किलो ग्राम स्‍फुर, 20 किलोग्राम पौटाश की आवश्‍यकता होती है। सिंचिंत फसल में उपरोक्‍त नत्रजन एंव पोटाश के साथ स्‍फुर 60 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर दें। देर से बोई गई चने की फसल में नत्रजन 40 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर की दर से दें। जीवाणु खाद राइजोबियम तथा पी.एच.बी. के साथ 2.5 टन प्रति हेक्‍टर कम्‍पोस्‍ट खाद का उपयोग लाभप्रद होता है।
असिंचित खेती में लाभदायक उपाय: चने की असिंचित खेती में नमी की कमी ही मुख्‍य समस्‍या होती है। इससे अंकुरण कम हो सकता है तथा पौधों की बढ़वार और बीज के आकार में कमी होने से उपज कम हो जाती है। इससे बचने के लिए बोआई के पूर्व बखर, पाटा चलाकर नमी संरक्षित करें। वर्षा होने या सिंचाई देने के बाद हेण्‍ड –? हो आवश्‍य चलायें इससे नमी एवं खरपतवार संरक्षण होगा।
सिंचाई: चने की फसल के लिए सामान्‍यरूप से दो सिंचाई की आवश्‍यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के पहले बुवाई के लगभग 40–50 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई घेंटियों में दाना भरते समय बुवाई के 60-65 दिन बाद करना चाहिए। यदि एक ही सिंचाई उपलब्‍ध है तो उसे फूल आने के पहले दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अधिक होती है और उपज में कमी आती है। फब्‍बारा विधि से सिंचाई करें। बहाव विधि से सिंचाई करने पर खेत को छोटी क्‍यारियों में बांट कर सिंचाई करें। इसके लिए बुवाई के तुरन्‍त बाद खेत में नालियां बना देना चाहिए।
अन्‍तर्वर्तीय फसलें: चने में अलसी और गेहूं को अन्‍तर्वर्तीय फसल के रूप में सफलतापूर्वक लिया जा सकता है। चना की चार कतारों के बाद अलसी या गेहूं की दो कतार के हिसाब से बुवाई अधिक लाभप्रद होती है।
खरपतवार नियंत्रण: असिंचित खेती में खरपतवार कम आते हैं, फिर भी बुवाई के लगभग एक माह बाद हेण्‍ड हो? चलाएं जिससे खरपतवार नियंत्रित होगा और नमी भी संरक्षित होगी। सिंचिंत फसल में नींदा नियंत्रण के लिए पेन्डिमिथलीन 1 लीटर प्रति हेक्‍टर 500–600 लीटर पानी मिलाकर अंकुरण पूर्व फलैट फेन नोजल से छिड़काव करें।
पौध संरक्षण:
(अ) रोग:
(1) जड़ तथा तने के रोग:
(1) उक्‍ठा रोग: इस रोग से नए पौधे मुरझाकर मर जाते हैं। सामान्‍यत: यह रोग लगभग 30 से 35 दिन की अवस्‍था में आता है। रूग्‍न पौधे के तने के नीचे वाले भाग को चीरकर देखने से आन्‍तरिक तन्‍तुओं में हल्‍का भूरा या काला रंग दिखाई देता है।
(2) कालर राट रोग: सोयाबीन की फसल लेने के बाद चना फसल लेने पर इसका प्रकोप बढ़ जाता है। रूग्‍न पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है और पौधे मर जाते हैं। पौधें की स्‍तम्‍भ मूल संधि भाग में सिकुडन प्रारंभ हो जाती है। प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखाई पड़ते हैं। सोयाबीन फसल के अवशेष खेत में होने तथा सिंचाई करने पर इसकी तीव्रता बढ़ जाती है।
(3) शुष्‍क विगलन रोग: पौधे पीले पड़ कर सूख जाते हैं। मृत जड़ शुष्‍क तथा कड़े हो जाती है। निचले हिस्‍से को फाड कर देखने से कोयले के कणों के समान स्‍कलेरोशिया दिखाई देते हैं। फली बनने की अवस्‍था में नमी की कमी तथा तापमान अधिक होने पर जड़ काली पड़ जाती है।
नियंत्रण: जड़ तथा तने वाले रोगों की रोकथाम के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। समय पर बोआई करें, अलसी की अंतवर्तीय फसल लें। फसल अवशेष को खेत से निकाल दें। रोग प्रतिरोधक जातियां लगायें। बीज उपचारित कर बुवाई करें।
(1) पत्तियों व शाखाओं के रोग
अल्‍टरनेरिया झुलसा रोग: फूल, फल बनते समय इस रोग का अधिक प्रकोप होता है। तने पर भूरे काले धब्‍बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगी पौधें को उखाड दें तथा फसल को अत्‍यधिक बढ़वार से बचाएं। कम प्रकोप होने पर मेन्‍कोजेब के 0.3 प्रतिशत घोल का फसल पर छिडकाव करें।
(ब) कीट: चने की इल्‍ली का बहुत अधिक प्रकोप होता है। इल्‍ली प्राय: हरे रंग की होती है परन्‍तु पीले, गुलाबी, भूरे व स्‍लेटी रंग की भी पायी जाती है। इल्लियों के बगल में लंबी सफेद पीली पटटी दोनों ओर आवश्‍यक रूप से पाई जाती है।
रासायनिक नियंत्रण: इण्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी 1.5 लीटर या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी 1.50 लीटर या क्विनालफॉस 25 ई.सी 1.00 लीटर को 500 - 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव करें। आवश्‍यकता पड़ने पर 15 दिन बाद पुन: कीटनाशक पावडर बदल कर छिड़काव करें। पंप या पानी उपलब्‍ध न हो तो क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से यन्‍त्र की सहायता से भुरकाव करें। यदि इल्लियां बड़ी हो गई हो और उपरोक्‍त कीटनाशकों से नियंन्त्रित नहीं हो रही हों तो मिश्रित कीटनाशकों का उपयोग करें जैसे प्रोफेनोफॉस + डेल्‍टामेथ्रिन का 1.50 लीटर या मिथोमिल का 1.00 लीटर प्रति हेक्‍टर छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। अंकुरण उपरांत टी (T) आकार की लकड़ी की खूटियां (50 प्रति हेक्‍टर ) खेत में समान रूप से लगायें जिस पर चिडियॉ बैठकर इल्‍ली को नियंत्रित रखेंगी।

उड़द

उड़द
मध्‍यप्रदेश में उड़द की खेती मंदसौर, झाबुआ, खरगोन, रतलाम, खण्‍डवा तथा धार जिले में अधिक होती है। मध्‍यप्रदेश में उड़द की उपज 2-4 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है जो कि बहुत कम है। उन्‍नत जातियों में 10-15 क्विंटल प्र‍ति हेक्‍टेयर पैदावार देने की क्षमता है। उड़द अधिकतर खरीफ मौसम में शुद्ध या अंर्तवर्तीय फसल के रूप में ली जाती है।
भूमि का चुनाव: उड़द की खेती विभिन्‍न प्रकार की भूमि में होती है। हल्‍की रेतीली, दुमट या मध्‍यम प्रकार की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्‍छा हो, उड़द के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। पी.एच. मान 7 से 8 के बीच वाली भूमि उड़द के लिये उपयुक्‍त होती है। अम्‍लीय व क्षारीय भूमि उपयुक्‍त नहीं है।
भूमि की तैयारी: वर्षा आरंभ होने के बाद दो-तीन बार हल बखर चलाकर खेत को समतल करें। वर्षा आरंभ होने से पहले बोनी करने से पौधे की बढ़वार अच्‍छी होती है।
उन्‍नत किस्‍में: मध्‍यप्रदेश के लिए अनुमोदित जातियों का चुनाव करें। जातियों की विशेषताएं निम्‍न प्रकार है:-
* बसंत बहार, टी.पी.यू-4 और बी.बी. 3: अधिक उपज देने वाली जातियॉ हैं।
* टाईप 9: पकने की अवधि 70-75 दिन, 1000 दानों का वजन 35 ग्राम, उपज 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। बीज मध्‍यम छोटा, हल्‍का काला व मध्‍यम ऊंचाई वाला पौधा।
* जवाहर उड़द-2 (आर.यू. 2): पकने की अवधि 70 दिन, 1000 दानों का वजन 33 ग्राम उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। बीज मध्‍यम छोटा, चमकीला काला, पौधा कम फैलने वाला, मुख्‍य तने पर ही फलियॉ, पास-पास गुच्‍छों में लगती हैं।
* जवाहर उड़द 3- (जे.यू. 77-41): पकने की अवधि 70 से 75 दिन, 1000 दानों का वजन 38 ग्राम, उपज 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर बीज मध्‍यम, छोटा हल्‍का काला, घनी रोऍ युक्‍त पौधा मध्‍यम कम फैलने वाला।
* खरगोन-3: पकने की अवधि 85 से 90 दिन, 1000 दानों का वजन 42 ग्राम, उपज 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर पौधा फैलने वाला व ऊंचा, बीज बड़ा, हल्‍का काला।
* पंत यू-30: दाने काले मध्‍यम आकार के होते हैं। यह 70 दिनों में पक जाती है। औसत उपज 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। यह रीवा व ग्‍वालियर तथा पीले मोजेक रोग से प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपयुक्‍त है।
फसल चक्र
1. उड़द-गेहूँ
2. उड़द-करडी
3. उड़द-सरसों
बीजोपचार एवं बीज दर: 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर बोना चाहिए। बोनी के पूर्व बीज को 3 ग्राम थायरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें।
बोनी का समय: मानसून के आगमन पर या जून के अंतिम सप्‍ताह में पर्याप्‍त वर्षा होने पर बुवाई करें।
बोने की विधि: बोनी नारी या तिफन से करें। कतारों की दूरी 30 सेमी. तथा पौधों की दूरी 10 सेमी. रखें एवं बीज 4-6 सेमी. की गहराई में बोयें।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा: नत्रजन 20 किलोग्राम व स्‍फुर 50 किलो ग्राम (100 कि. डी.ए.पी. प्रति हेक्‍टेयर) के हिसाब से सम्‍पूर्ण खाद की मात्रा बुवाई के समय कतारों में बीज के ठीक नीचे डालना चाहिये। दलहनी फसलों में गंधकयुक्‍त उर्वरक जैसे सिंगल सुपर फास्‍फेट, अमोनियम, सल्‍फेट, जिप्‍सम आदि का उपयोग करना चा‍हिए। विशेषत: गंधक की कमी वाले क्षेत्र में 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्‍टेयर गंधक युक्‍त उर्वरकों से दें। भूमि में पोटाश की कमी होने पर 20 किलोग्राम पोटाश/हेक्‍टेयर बुवाई के समय दें।
सिंचाई: फूल एवं दाना भरने की अवस्‍था पर खेत में नमी कम हो तो एक सिंचाई फसल को देना चाहिये।
निंदाई-गुड़ाई: खरपतवार फसलों को अनुमान से कही अधिक क्षति पहुंचाते हैं। अत: विपुल उत्‍पादन के लिये समय पर निंदाई-गुड़ाई कुल्‍पा व डोरा आदि चलाते हुए अन्‍य आधुनिक नींदानाशक का समुचित उपयोग करना चाहिए। नींदानाशक बासलीन 2 से 2.5 लीटर प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोल बनाकर जमीन बखरने के पूर्व नमी युक्‍त खेत में छिड़कने से अच्‍छे परिणाम मिलते हैं।
पौध संरक्षण:
(अ) कीट: उड़द की फसल को 16 प्रकार के कीट अगस्‍त व सितम्‍बर माह में हानि पहुंचाते हैं, जिससे 38 प्रतिशत तक उपज में कमी आ सकती है।
1. रस चूसने वाले कीट: फुदका माहो, सफेद मक्‍खी, थ्रिप्‍स आदि के निम्‍फ व प्रोढ़ पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तियॉ पीली होकर गिर जाती है। सफेद मक्‍खी मोजक विषाणु रोग वाहक हैं। इनके नियंत्रण हेतु डायमेथियोट 30 ई.सी. 0.3 प्रतिशत या फास्‍फारेसिडान 25 एम.एल. 250 एम.एल. प्रति हेक्‍टेयर या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. 1000 मि.ली./हेक्‍टेयर का छिड़काव करें।
2. फली बीटल: यह कीट भूरा व काला होता है जो पत्तियों को कुतर कर गोल छेद बनता है जिससे पत्तियॉ छलनी हो जाती है। क्विनाफास 1.5 प्रतिशत या थायोडान 4 प्रतिशत डस्‍ट 20 किग्रा. / हेक्‍टेयर 15 दिन क अंतर से दो बार फसल पर भुरकाव करें।
3. इल्लियॉ: ये 5 प्रकार की होती हैं जो हरी, भूरी, काली, लाल व रोऍदार होती हैं तथा पत्तियों खाती हैं। फालीडाल 2 प्रतिशत या थायोडान 4 प्रतिशत डस्‍ट 20 किग्रा./हेक्‍टेयर का फसल पर भुरकार करें।
4. फली छेदक इल्‍ली: यह इल्‍ली मटमैले रंग की काली धब्‍बे वाली होती है जो तना फूल व फलियों के अंदर घुसकर क्षति पहुंचाती है। इससे 40 प्रतिशत फलियॉ क्षतिग्रस्‍त होती हैं एवं 15 से 20 प्रतिशत उपज में हानि होती है। फलियॉ बनते समय एक लीटर मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. प्रति हेक्‍टेयर छिड़कें तथा आवश्‍यकता होने पर 15 दिन बाद दोहरायें। उड़द की जल्‍दी पकने वाली जातियॉ पंत यू. 30 में अपेक्षाकृत कम कीट लगते हैं।
(ब) रोग
1. पावडरी मिल्‍ड्य: यह रोग पौधा अवस्‍था में फलियॉ लगने तक कभी भी देखा जा सकता है। इस रोग के कारण पैदावार में काफी क्षति होती है। यह रोग प्रारंभिक अवस्‍था के समय आता है तो पौधे पूर्ण रूप से सूख जाते हैं। इस रोग से पत्तियॉ, शाखाओं और फलियों पर सफेद चूर्ण सा दिखाई देता है। यह रोग अगस्‍त माह के प्रथम सप्‍ताह में प्रारंभ होता है। देर से बोई गई फसल पर इस रोग का प्रकोप अधिक होता है।
नियंत्रण:
1. घुलनशील गंधक 30 ग्राम 10 लीटर पानी में
2. कार्बन्‍डाजिम 10 ग्राम 10 लीटर पानी में अथवा
3. केरेथन एल.सी. 3 मि.ली. 10 लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिन के अंतर से छिड़काव करें।
4. रोग रोधक जातियॉ उड़द ए.बी.जी. 17 का चुनाव करें।
2. मेक्रोफौमिना पर्ण दाग तथा तना विगलन रोग: इस रोग के मुख्‍य लक्षण पौधों की जड़ों, तनों के विगलन में तथा पत्‍तों पर भूरे लाल रंग के धब्‍बों के रूप में दिखाई पड़ते हैं। यह रोग पौधों की किसी भी अवस्‍था में आता है। अंकुरण के एक माह बाद पौधे संक्रमित होने लगते हैं तथा जड़ तना सड़न के कारण पौधे मरने लगते हैं या छोटे रह जाते हैं। विगलन जड़ से शुरू होकर तने तक फैलता है तथा भूमि के निकट तने पर लाल भूरे रंग से लेकर काले रंग के धब्‍बे बनते हैं। तने पर असंख्‍य काले रंग के स्‍केलेरोशिया बनते हैं। संक्रमित तना बाद में काले रंग का हो जाता है।
नियंत्रण:
1. थीरम 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के साथ मिलाकर बीजोपचार करें।
2. फसलचक्र अपनाएं, रोग रोधी फसलें जैसे ज्‍वार, बाजरा इत्‍यादि की बोनी करें।
3. पीला मोजेक: इस रोग के कारण उपज में बहुत अधिक कमी होती है। उपज में कमी संक्रमण की अवस्‍था पर निर्भर करती है। यदि संक्रमण फसल की प्रारंभिक अवस्‍था में होता है तब उपज बिलकुल नहीं होती है। रोग के प्रथम लक्षण पत्तियों पर गोलाकार पीले धब्‍बे के रूप में दिखाई देते हैं। ये दाग एक साथ मिलकर तेजी से फैलते हैं, जिससे पत्तियों पर पीले धब्‍बे, हरे धब्‍बे के अगल-बगल दिखाई देते हैं जो बाद में बिल्कुल पीले हो जाते हैं। नई निकलती हुई पत्तियों में से लक्षण आरंभ से ही दिखाई देते हैं। यह रोग सफेद मक्‍खी द्वारा संचारित होता है।
नियंत्रण:
1. सफेद मक्‍खी की रोकथाम हेतु मैटासिस्‍टाक्‍स 0.1 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर से करें।
2. रोगी पौधों को उखाड़कर जला दें।
3. रोग रोधी जातियॉ जैसे उड़द पंत यू 19 एवं पंत यू 30 की बोनी करें।
कटाई एवं उपज: फसल पूरी तरह पक जाने पर कटाई करें। उन्‍नत कृषि कार्यमाला अपनाने से उड़द की पैदावार 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर प्राप्‍त की ज सकती है।

अरहर

अरहर
भारत विश्‍व में दलहनी फसलों के क्षेत्रफल एवं उत्‍पादन में प्रथम स्‍थान पर है। देश में दलहनी फसलें 2 करोड़ 38 लाख हेक्‍टर भूमि में बोई जाती है, जिनकी उत्‍पादकता केवल 622 कि.ग्रा/हे. जो कि बहुत कम है। मध्‍यप्रदेश का स्‍थान दलहनी फसलों के क्षेत्र एवं उत्‍पादन में क्रमश: पहला व दूसरा है। मध्‍यप्रदेश में दलहनी फसलें 50.4 लाख हेक्‍टर भूमि में उगाई जाती हैं, यह सीधे नत्रजन ग्रहण कर पौधों को देती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। दलहनी फसलें खाद्यान्‍न फसलों की अपेक्षा अधिक सूखारोधी होती हैं। इसलिये सूखा ग्रस्‍त प्रदेशों में भी इससे अधिक उपज मिलती है। कम अवधि की दलहनी फसलें अंतरवर्तीय व बहुफसली पद्धति में उपयुक्‍त होती हैं। दलहन प्रोटीन का सशक्‍त स्रोत है, इसलिए आम भारतवासियों के भोजन में इनका समावेश होता है।
खरीफ की दलहनी फसलों में अरहर प्रमुख है। मध्‍य प्रदेश में अरहर की खेती लगभग 4.75 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में की जाती है जिससे औसतन 842 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर उत्‍पादन होता है। उन्‍नत तकनीक से अरहर का उत्‍पादन दो गुना किया जा सकता है।
भूमि का चुनाव एवं तैयारी: इसे विविध प्रकार की भूमि में लगाया जा सकता है, पर हल्‍की रेतीली दोमट या मध्‍यम भूमि जिसमें प्रचुर मात्रा में स्‍फुर तथा पी.एच.मान 7-8 के बीच हो व समुचित जल निकासी वाली हो, इस फसल के लिये उपयुक्‍त है। गहरी भूमि व पर्याप्‍त वर्षा वाले क्षेत्र में मध्‍यम अवधि की या देर से पकने वाली जातियॉं बोनी चाहिए। हल्‍की रेतीली कम गहरी ढलान वाली भूमि में व कम वर्षा वाले क्षेत्र में जल्‍दी पकने वाली जातियॉं बोनी चाहिए। देशी हल या ट्रेक्‍टर से दो-तीन बार खेत की गहरी जुताई करें व पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जल निकासी की समुचित व्‍यवस्‍था करें।
बोनी का समय, बीज की मात्रा व तरीका: अरहर की बोनी वर्षा प्रारंभ होने के साथ ही कर देना चाहिए। सामान्‍यत: जून के अंतिम सप्‍ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करें। जल्‍दी पकने वाली जातियों में 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर एवं मध्‍यम पकने वाली जातियों में 15 से 20 किलो ग्राम बीज/हेक्‍टेयर बोना चाहिए। कतारों के बीच की दूरी शीघ्र पकने वाली जातियों के लिए 30 से 45 से.मी व मध्‍यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 60 से 75 सें.मी. रखना चाहिए। कम अवधि की जातियों के लिए पौध अंतराल 10-15 से.मी. एवं मध्‍यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 20–25 से.मी. रखें।
बीजोपचार: बोनी के पूर्व फफूदनाशक दवा से बीजोपचार करना बहुत जरूरी है। 2 ग्राम थायरस + ग्राम? कार्बेन्‍डेजिम फफूदनाशक दवा प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। उपचारित बीज को रायजोबियम कल्‍चर 10 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। पी.एच.बी. कल्‍चर का उपयोग करें।
जातियों का चुनाव: भूमि का प्रकार, बोने का समय, जलवायु आदि के आधर पर अरहर की जातियों का चुनाव करना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जहॉ सिंचाई के साधन उपलब्‍ध हो बहुफसलीय फसल पद्धति हो या रेतीली हल्‍की ढलान वाली व कम वर्षा वाली असिंचित भूमि हो तो जल्‍दी पकने वाली जातियां बोनी चाहिए। मध्‍यम गहरी भूमि में जहॉं पर्याप्‍त वर्षा होती हो और सिंचित एवं असिंचित स्थिति में मध्‍यम अवधि की जातियॉ बोनी चाहिए।
उरर्वरक का प्रयोग: बुवाई के समय 20 किग्रा. नत्रजन 50 किग्रा स्‍फुर 20 किग्रा पोटाश व 20 किग्रा गंधक प्रति हेक्‍टेयर कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिए। तीन वर्ष में एक बार 25 कि.ग्रा जिंक सल्‍फेट का उपयोग आखरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्‍छी बढ़ोत्‍तरी होती है।
सिंचाई: जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्‍ध हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियॉ बनने की अवस्‍था पर करने से पैदावार अच्‍छी होती है।
खरपतवार प्रबंधन: खरपतवार नियंत्रण के लिए 20-25 दिन में पहली निंदाई तथा फूल आने से पूर्व दूसरी निंदाई करें। 2-3 बार खेत में कोल्‍पा चलाने से निंदाओं पर अच्‍छा नियंत्रण रहता है व मिटटी में वायु संचार बना रहता है। पेन्‍डीमेथीलिन 1.25 किग्रा सक्रिय तत्‍व/हे. बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है। नींदानाशक प्रयोग के बाद एक नींदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्‍था पर करनी चाहिए।
अंतरवर्तीय फसल: अंतरवर्तीय फसल पद्धति से मुख्‍य फसल को पूर्ण पैदावार एवं अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्‍त पैदावार प्राप्‍त होगी। मुख्‍य फसल में कीटों का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता होने पर किसी न किसी फसल से सुनिश्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पद्धति में कीटों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। निम्‍न अंतरवर्तीय फसल पद्धति म.प्र. के लिए उपयुक्‍त है:
1. अरहर + मक्‍का या ज्‍वार 2:1 कतारों के अनुपात में (कतारों के बीच की दूरी 40 से.मी)
2. अरहर + मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों के अनुपात में
3. अरहर + उड़द या मूंग 1:2 कतारों के अनुपात में
पौध संरक्षण:
(अ) रोग:
उकटा रोग: इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह फयूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणतया फसल में फूल लगने की अवस्‍था पर दिखाई देते हैं। नवम्‍बर से जनवरी महीनें के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इससें जडें सड़ कर गहरें रंग की हो जाती हैं तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की ऊचाई तक काले रंग की धारियॉ पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिए रोग रोधी जातियॉ जैसे सी–11 जवाहर के.एस-7 बी.एस.एम.आर–853, आशा आदि बोयें। उन्‍नत जातियों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें । गर्मी में खेत की गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्‍वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।
2. बांझपन विषाणु रोग: यह रोग विषाणु (वायरस) से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी शाखाओं में पत्तियॉ छोटी , हल्‍के रंग की तथा अधिक लगती हैं और फूल – फली नही लगती है। रूग्‍न पौधों में पत्तियॉ अधिक लगती है। यह रोग माइट मकडी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्‍मों को लगाना चाहिए। खेत में उग आये बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड कर नष्‍ट कर देना चाहिए। मकडी का नियंत्रण करना चाहिए।
3. फायटोपथोरा झुलसा रोग: रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्‍सील फफूंदनाशक दवा प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुआई पाल (रिज) पर करना चाहिए और मूंग की फसल साथ में लगायें।
ब. कीट:
1. फली मक्‍खी : यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्‍ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ़ बनकर बाहर आती है। दानों का सामान्‍य विकास रूक जाता है।
मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृद्धिरत फलियों में अंडे रोपण करती हैं। अंडो से मेगट बाहर आते हैं और दाने को खाने लगते हैं। फली के अंदर ही मेगट शंखी में बदल जाती हैं जिसके कारण दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है और दानों का आकार छोटा रह जाता है। तीन सप्‍ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।
2. फली छेदक इल्‍ली: छोटी इल्लियॉ फलियों के हरे उत्‍तकों को खाती हैं व बडे होने पर कलियों , फूलों फलियों व बीजों को नुकसान पहुंचाती हैं। इल्लियॉ फलियों पर टेढे – मेढे छेद बनाती हैं।
इस कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती हैं। इल्लियॉ पीली, हरी, काली रंग की होती हैं तथा इनके शरीर पर हल्‍की गहरी पटिटयॉ होती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्‍ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती हैं।
3. फल्‍ली का मत्‍कुण: मादा प्राय: फलियों पर गुच्‍छों में अंडे देती हैं। अंडे कत्‍थई रंग के होते हैं। इस कीट के शिशु वयस्‍क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं, जिससे फली आडी-तिरछी हो जाती है एवं दाने सिकुड जाते हैं। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्‍ताह में पूरा करते हैं।
4. प्‍लू माथ: इस कीट की इल्‍ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विष्‍टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दानो के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है।
5. ब्रिस्‍टल ब्रिटल: ये भृंग कलियों, फूलों तथा कोमल फलियों को खाती हैं जिससे उत्‍पादन में काफी कमी आती है। यह कीट अरहर मूंग, उड़द, तथा अन्‍य दलहनी फसलों को भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकडकर नष्‍ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।
(ब) कीट:
कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित प्रणाली अपनाना आवश्‍यक है
1. कृषि कार्य द्वारा: गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें
2. शुद्ध अरहर न बोयें
3. फसल चक्र अपनायें
4. क्षेत्र में एक ही समय बोनी करनी चाहिए
5. रासायनिक खाद की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करें।
6. अरहर में अन्‍तरवर्तीय फसलें जैसे ज्‍वार, मक्‍का, या मूंगफली को लेना चाहिए।
2. यांत्रिक विधि द्धारा:
1. फसल प्रपंच लगाना चाहिए
2. फेरामेन प्रपंच लगाये
3. पौधों को हिलाकर इल्लियों को गिरायें एवं उनकों इकटठा करके नष्‍ट करें
4. खेत में चिडियों के बैठने की व्‍यवस्‍था करे।
3. जैविक नियंत्रण द्वारा:
1. एन.पी.वी 5000 एल.ई/हे.+ यू.वी. रिटारडेन्‍ट 0.1 प्रतिशत + गुड 0.5 प्रतिशत मिश्रण का शाम के समय खेत में छिडकाव करें।
2. बेसिलस थूरेंजियन्‍सीस 1 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर + टिनोपाल 0.1 प्रतिशत + गुड 0.5 प्रतिशत का छिड़काव करे।
4 जैव – पौध पदार्थ के छिड़काव द्वारा:
1. निंबोली सत 5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
2. नीम तेल या करंजी तेल 10 -15 मी.ली. + 1 मी.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेन्‍डोविट टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
3. निम्‍बेसिडिन 0.2 प्रतिशत या अचूक 0.5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
5. रासायनिक नियंत्रण द्वारा:
1. आवश्‍यकता पड़ने पर ही कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करें।
2. फली मक्‍खी नियंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनाशक दवाओं का छिडकाव करें जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी 0.03 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 0.04 प्रतिशत आदि।
3. फली छेदक इल्लियों के नियंत्रण के लिए– फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण या क्‍लीनालफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण या इन्‍डोसल्‍फान 4 प्रतिशत चूर्ण का 20 से 25 किलोग्राम/हे. की दर से भुरकाव करें या इन्‍डोसलफॉन 35 ईसी. 0.7 प्रतिशत या क्‍वीनालफास 25 ई.सी 0.05 प्रतिशत या क्‍लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 0.6 प्रतिशत या फेन्‍वेलरेट 20 ई.सी 0.02 प्रतिशत या एसीफेट 75 डब्‍लू पी 0.0075 प्रतिशत या ऐलेनिकाब 30 ई.सी 500 ग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हे. या प्राफेनोफॉस 50 ई.सी एक लीटर प्रति हे. का छिड़काव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतु प्रथम छिडकाव सर्वागीण कीटनाशक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्‍पर्श या सर्वागीण कीटनाशक दवाई का छिड़काव करें। कीटनाशक का तीन छिड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर दूसरा 50 प्रतिशत फुल बनने पर और तीसरा फली बनने की अवस्‍था पर करना चाहिए।
नोट: इन्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी 0.07 प्रतिशत का छिड़काव करें। यह लाभदायी कीट केम्‍पोलिटेसीस क्‍लोरिडी नामक कीट के लिए बहुत सुरक्षित पाया गया है।
कटाई एवं गहाई: जब पौधे की पत्तियॉं गिरने लगे एवं फलियॉ सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाए तब फसल को काट लेना चाहिए। खलिहान में 8-10 दिन धूप में सूखाकर ट्रेक्‍टर या बैलों द्वारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को 8-9 प्रतिशत नमी रहने तक सूखाकर भण्‍डारित करना चाहिए।
उन्‍नत उत्‍पादन तकनीक अपनाकर अरहर की खेती करने से 15-20 क्विं/हे. उपज असिंचित अवस्‍था में और 25-30 क्विं/हे. उपज सिंचित अवस्‍था में प्राप्‍त की जा सकती है।

Friday, May 8, 2009

मूंगफली

मूंगफली म.प्र. की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। राज्‍य में इसकी उत्‍पादकता स्थिर नहीं है। इसका प्रमुख कारण वर्षा की अनिश्चित्‍ता, सूखा पड़ना अथवा कभी- कभी लगातार वर्षा होना तथा किसानों द्वारा इस फसल की उन्‍नत कृषि कार्यमाला को न अपनाना आदि है।
भूमि का चुनाव: पानी का अच्‍छा निकास, हल्‍की से मध्‍यम रेतीली कछारी या दुमट भूमि उपयुक्‍त है।
भूमि की तैयारी: तीन साल के अन्‍तराल में एक बार गहरी जुताई करें इसके बाद दो बार देशी हल या कल्‍टीवेटर चलायें एवं बखर चलाकर पाटा लगाना चाहिए।
बीज दर: 100–120 किलोग्राम/हेक्‍टेयर दाने बोने से 3.33 लाख के लगभग पौध संख्‍या प्राप्‍त होती है।
बीजोपचार: 3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बनडेजिम दवा/किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। पौधों के सूखने की समस्‍या वाले क्षेत्र में 2 ग्राम थीरम + 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम/किलो ग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें या जैविक उपचार ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम चूर्ण/किलो ग्राम बीज की दर से उपयोग करें। इसके पश्‍चात 10 ग्राम/किलो ग्राम बीज के मान से रायजोबियम कल्‍चर (मूंगफली) से भी उपचार करें।
बोने का समय: वर्षा प्रारंभ होने पर जून के मध्‍य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करनी चाहिए।
बोने का तरीका: बोनी कतारों में सरता दुफन या तिफन से लगभग 4-6 से.मी. गहराई पर करना चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे की दूरी 8–10 से.मी. रखनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक: भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद 5-10 टन/हेक्‍टेयर प्रयोग करें। उर्वरक के रूप में 20 किलोग्राम नत्रजन, 40–80 किलोग्राम स्‍फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाश/ हेक्‍टेयर देना चाहिए। यदि खेत में गोबर की खाद तथा पी.एस.बी. का प्रयोग किया जाता है तो स्‍फुर की मात्रा 80 किलो ग्राम/हेक्‍टर की जगह मात्र 40 किलो ग्राम/हेक्‍टेयर ही पर्याप्‍त है। खाद की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में प्रयोग करें। मूंगफली फसल में गंधक का विशेष महत्‍व है। इसलिए 25 किलो ग्राम/हेक्‍टेयर के मान से गंधक अवश्‍य दिया जाना चाहिए। यदि यूरिया की जगह अमोनिया सल्‍फेट तथा फास्‍फेट के रूप में सिंगल सुपर फास्‍फेट का प्रयोग किया जाता है तो गंधक पर्याप्‍त मात्रा में मिल जाता है। अन्‍यथा 2 क्विंटल/हेक्‍टेयर की दर से जिप्‍सम या पाइराइटस का उपयोग आखिरी बखरनी के साथ करें। साथ ही 25 किलो ग्राम/हेक्‍टेयर के मान से तीन साल के अन्‍तर पर जिंक सल्‍फेट का प्रयोग अवश्‍य करें।
फसल चक्र:
1. मूंगफली (खरीफ)– गेहूं (रबी)
2. मूंगफली (खरीफ) – मक्‍का (खरीफ)
3. मूंगफली (खरीफ)– चना (रबी)
4. मूंगफली ग्रीष्‍म कपास (खरीफ)
5. मूंगफली ग्रीष्‍म मक्‍का/ज्‍वार/कपास
अंतर्वतीय फसलें: अन्‍तर्वतीय फसल के रूप में मक्‍का, ज्‍वार, सोयाबीन, मूंग, उड़द, तुअर, सूर्यमुखी आदि फसलों को 4:2, 2:1, 8:2, 3:1, 6:3, 9:3 के अनुपात में आवश्‍यकतानुसार लिया जा सकता है।
सिचाई: सिंचाई की सुविधा होने पर अवर्षा से उत्‍पन्‍न सूखे की अवस्‍था में पहला पानी 50-55 दिन में तथा दूसरा पानी 70–75 दिन में दिया जाना चाहिए।
निंदाई–गुडाई: फसल बोने के 15-20, 25-30 तथा 40-45 दिन की अवस्‍था में डोरा या कोल्‍पा चलायें जिससे समय–समय पर नींदा नियंत्रण किया जा सके। नींदानाशक दवाओं के उपयोग से भी नींदा नियंत्रण किया जा सकता है।
नोट: आवश्‍यकता पड़ने पर ही खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग पूर्ण सावधानी अपनाते हुये करें।
पौध संरक्षण
(अ) कीडे: बोडला कीट (ब्‍हाइट ग्रब)
(आ) मई–जून के महीने में खेत की दो बार जुताई करनी चाहिए।
(ब) अगेती बुआई ‘’10-20 जून के बीच‘’ करनी चाहिए।
(स) मिटटी में फोरेट 10 जी या कारबोफयूरान 3 जी 25 किलो ग्राम/हेक्‍टेयर डालना चाहिए।
(द) बीज को फफूंदनाशक उपचार से पहले क्‍लोरपायरीफास 12.5 मि.ली/किलो ग्राम बीज को उपचार कर छाया में सुखकर बोनी चाहिए।
कामलिया कीट: मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 से 30 किलो ग्राम/हे. प्रारंभिक अवस्‍था में भुरकाव या पैराथियान 50 ईसी का 700 से 750 मिली./हे. के मान से छिड़काव करें।
महों, थ्रिप्‍स एवं सफेद मक्‍खी: इनके नियंत्रण लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ईसी का 550 मि.ली./हे. या डाईमिथिएट का 30 ईसी का 500 मि.ली./हे. 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।
सूरंग कीट: क्‍यूनालफास 25 ई.सी का 1000 मि.ली या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 600 मि.ली/हे. का छिड़काव करें।
चूहा एवं गिलहरी: यह भी मूंगफली को नुकसान पहुंचाते हैं अत: इनके नियंत्रण पर ध्‍यान दें।
(ब) रोग:
टिक्‍का/पर्ण धब्‍बा: बोने के 4-5 सप्‍ताह से प्रारंभ कर 2-3 सप्‍ताह के अन्‍तर से दो-तीन बार कार्बेन्‍डाजिम 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम–45 का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।
कालर सडन/शुष्‍क जड़ सड़न: बीज को 5 ग्राम थाइरम अथवा 3 ग्राम डाइथेन एम-45 या 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिए।
फसल कटाई: जैसे ही फसल पीली पड़ने लगे तथा प्रति पौधा 70-80 प्रतिशत फली पक जावें उस समय पौधों को उखाड़ लेना चाहिए। फलियों को धूप में इतना सूखाना चाहिए कि नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये तभी बोरों में रखकर भण्‍डारण नमी रहित जगह पर करें। बोरियों रखने के बाद उन पर मेलाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिए।
उपज: समयानुकूल पर्याप्‍त वर्षा होने पर खरीफ में मूंगफली की उपज लगभग 15 से 20 क्विंटल/हे. तक ली जा सकती हैं

सोयाबीन

भूमि का चुयन एवं तैयारी: सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन न उगाये।
ग्रीष्‍म कालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्‍य करनी चाहिए। वर्षा प्रारम्‍भ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए। इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्थाएं नष्‍ट होंगे। ढेला रहित और भूरभुरी मिटटी वाले खेत सोयाबीन के लिए उत्‍तम होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अत: अधिक उत्पादन के लिए खेत में जल ‍निकास की व्यवस्था करना आवश्‍यक होता है। जहां तक संभव हो आखरी बखरनी एवं पाटा समय से करें जिससे अंकुरित खरपतवार नष्‍ट हो सके। यथासंभव मेंड़ और कूड़ रिज एवं फरो बनाकर सोयाबीन बोय।
बीज दर:
1. छोटे दाने वाली किस्‍में– 70 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर
2. मध्‍यम दोन वाली किस्‍में– 80 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर
3. बड़े दाने वाली किस्‍में– 100 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर
बोने का समय: जून के अन्तिम सप्‍ताह से जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक का समय सबसे उपयुक्‍त है। बोने के समय अच्‍छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्‍त नमी होनी चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्‍ताह के पश्‍चात बोनी की बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देनी चाहिए।
पौध संख्‍या: 4–5 लाख पौधे प्रति हेक्‍टेयर ‘’40 से 60 प्रति वर्ग मीटर‘’ पौध संख्‍या उपयुक्‍त है। जे.एस. 75–46, जे.एस. 93–05 किस्‍मों में पौधों की संख्‍या 6 लाख प्रति हेक्‍टेयर उपयुक्‍त है। असीमित बढ़ने वाली किस्‍मों के लिए 4 लाख एवं सीमित वृद्धि वाली किस्‍मों के लिए 6 लाख पौधे प्रति हेक्‍टेयर होने चाहिए।
बोने की विधि: सोयाबीन की बौनी कतारों में करनी चाहिए। कतारों की दूरी 30 सेमी. ‘’बौनी किस्‍मों के लिए‘’ तथा 45 सेमी. बड़ी किस्‍मों के लिए उपयुक्‍त है। 20 कतारों के बाद कूड़ जल निथार तथा नमी संरक्षण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। बीज 2.5 से 3 सेमी. गहराई त‍क बोयें। बीज एवं खाद को अलग-अलग बोना चाहिए जिससे अंकुरण क्षमता प्रभावित न हो।
बीजोपचार: सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदा जनित रोग प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम हेतु बीज को थीरम या केप्‍टान 2 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम या थायोफेनेट मिथाईल, 1 ग्राम मिश्रण प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए अथवा ट्राइकोडरमा 4 ग्राम एवं कार्बेन्‍डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज से उपचारित करके बोयें।
कल्‍चर का उपयोग: फफूँदनाशक दवाओं से बीजोपचार के पश्‍चात बीज को 5 ग्राम राइजोबियम एवं 5 ग्राम पी.एस.बी.कल्‍चर प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। उपचारित बीज को छाया में रखना चाहिए एवं शीघ्र बौनी करना चाहिए। ध्‍यान रहें कि फफूँदनाशक दवा एवं कल्‍चर को एक साथ न मिलाऐं।
समन्वित पोषण प्रबंधन: अच्‍छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्‍पोस्‍ट) 5 टन प्रति हेक्‍टेयर अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्‍छी तरह मिला दें तथा बोते समय 20 किलो नत्रजन, 60 किलो स्‍फुर, 20 किलो पोटाश एवं 20 किलो गंधक प्रति हेक्‍टेयर दें। यह मात्रा मिटटी परीक्षण के आधर पर घटाई बढ़ाई जा सकती है तथा संभव नाडेप, फास्‍फो कम्‍पोस्‍ट के उपयोग को प्राथमिकता दें। रासायनिक उर्वरकों को कूड़ों में लगभग 5 से 6 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिए। गहरी काली मिटटी में जिंक सल्‍फेट, 50 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर एवं उथली मिटिटयों में 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिए।
खरपतवार प्रबंधन: फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्‍यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्‍फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निंदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें। 15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारो को नष्‍ट करने के लिए क्‍यूजेलेफोप इथाइल एक लीटर प्रति हेक्‍टेयर अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवारों के लिए इमेजेथाफायर 750 मिली. ली. प्रति हेक्‍टेयर की दर से छिड़काव की अनुशंसा की गई है। नींदानाशक के प्रयोग में बोने के पूर्व फलुक्‍लोरेलीन 2 लीटर प्रति हेक्‍टेयर आखरी बखरनी के पूर्व खेतों में छिड़कें और पेन्‍डीमेथलीन 3 लीटर प्रति हेक्‍टेयर या मेटोलाक्‍लोर 2 लीटर प्रति हेक्‍टेयर की दर से 600 लीटर पानी में घोलकर फलैटफेन या फलेटजेट नोजल की सहायकता से पूरे खेत में छिड़काव करें। तरल खरपतवार नाशियों के प्रयोग के मामले में मिटटी में पर्याप्‍त पानी व भुरभुरापन होना चाहिए।।
सिंचाई: खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्‍यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्‍यकता नहीं होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितंबर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्‍त न हो तो आवश्‍यकतानुसार एक या दो हल्‍की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्‍पादन लेने हेतु लाभदायक है।
पौध संरक्षण:
कीट: सोयाबीन की फसल पर बीज एवं छोटे पौधे को नुकसान पहुंचाने वाला नीलाभृंग (ब्‍लूबीटल) पत्‍ते खाने वाली इल्लियां, तने को नुकसान पहुंचाने वाली तने की मक्‍खी एवं चक्रभृंग (गर्डल बीटल) आदि का प्रकोप होता है एवं कीटों के आक्रमण से 5 से 50 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ जाती है। इन कीटों के नियंत्रण के उपाय निम्‍नलिखित हैं:
कृषिगत नियंत्रण: खेत की ग्रीष्‍मकालीन गहरी जुताई करें। मानसून की वर्षा के पूर्व बोनी नहीं करें। मानसून आगमन के पश्‍चात बोनी शीघ्रता से पूरी करें। खेत नींदा रहित रखें। सोयाबीन के साथ ज्‍वार अथवा मक्‍का की अंतरवर्तीय खेती करें। खेतों को फसल अवशेषों से मुक्‍त रखें तथा मेढ़ों की सफाई रखें।
रासायनिक नियंत्रण: बुआई के समय थयोमिथोक्‍जाम 70 डब्‍लू एस.3 ग्राम दवा प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करने से प्रारम्भिक कीटों का नियंत्रण होता है अथवा अंकुरण के प्रारम्‍भ होते ही नीला भृंग कीट नियंत्रण के लिए क्‍यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पेराथियान (फालीडाल 2 प्रतिशत या धानुडाल 2 प्रतिशत) 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए। कई प्रकार की इल्लियां पत्‍ती, छोटी फलियों और फलों को खाकर नष्‍ट कर देती हैं। इन कीटों के नियंत्रण के लिए घुलनशील दवाओं की निम्‍नलिखित मात्रा 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। हरी इल्‍ली की एक प्रजाति जिसका सिर पतला एवं पिछला भाग चौड़ा होता है, सोयाबीन के फूलों और फलियों को खा जाती है जिससे पौधे फली विहीन हो जाते हैं। फसल बांझ होने जैसी लगती है। चूंकि फसल पर तना मक्‍खी, चक्रभृंग, माहो हरी इल्‍ली लगभग एक साथ आक्रमण करते हैं अत: प्रथम छिड़काव 25 से 30 दिन पर एवं दूसरा छिड़काव 40-45 दिन पर फसल पर आवश्‍य करना चाहिए।
छिड़काव यन्‍त्र उपलब्‍ध न होने की स्थिति में निम्‍नलिखित में से किसी एक पावडर (डस्‍ट) का उपयोग 20–25 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर की दर से करना चाहिए
1. क्‍यूनालफॉस – 1.5 प्रतिशत
2. मिथाईल पैराथियान – 2.0 प्रतिशत
जैविक नियंत्रण: कीटों के आरम्भिक अवस्‍था में जैविक कट नियंत्रण हेतु बी.टी एवं ब्‍यूवेरीया बैसियाना आधरित जैविक कीटनाशक 1 किलोग्राम या 1 लीटर प्रति हेक्‍टेयर की दर से बुवाई के 35-40 दिनों तथा 50-55 दिनों बाद छिड़काव करें। एन.पी.वी. का 250 एल.ई समतुल्‍य का 500 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हेक्‍टेयर छिड़काव करें। रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैविक कीटनाशकों को अदला-बदली कर डालना लाभदायक होता है।
1. गर्डल बीटल प्रभावित क्षेत्र में जे.एस. 335, जे.एस. 80–21, जे.एस 90–41 , लगायें
2. निंदाई के समय प्रभावित टहनियां तोड़कर नष्‍ट कर दें
3. कटाई के पश्‍चात बंडलों को सीधे गहराई स्‍थल पर ले जावें
4. तने की मक्‍खी के प्रकोप के समय छिड़काव शीघ्र करें
(ब) रोग:
1. फसल बोने के बाद से ही फसल की निगरानी करें। यदि संभव हो तो लाइट ट्रेप तथा फेरोमेन टयूब का उपयोग करें।
2. बीजोपचार आवश्‍यक है। इसके बाद रोग नियंत्रण के लिए फफूँद के आक्रमण से बीज सड़न रोकने हेतु कार्बेन्‍डाजिम 1 ग्राम + 2 ग्राम थीरम के मिश्रण से प्रति किलो ग्राम बीज उपचारित करना चाहिए। थीरम के स्‍थान पर केप्‍टान एवं कार्बेन्‍डाजिम के स्‍थान पर थायोफेनेट मिथाइल का प्रयोग किया जा सकता है।
3. पत्‍तों पर कई तरह के धब्‍बे वाले फफूंद जनित रोगों को नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्‍डाजिम 50 डबलू पी या थायोफेनेट मिथाइल 70 डब्‍लू पी 0.05 से 0.1 प्रतिशत से 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव 30 -35 दिन की अवस्‍था पर तथा दूसरा छिड़काव 40 – 45 दिनों की अवस्‍था पर करना चाहिए।
4. बैक्‍टीरियल पश्‍चयूल नामक रोग को नियंत्रित करने के लिए स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्‍लीन या कासूगामाइसिन की 200 पी.पी.एम. 200 मि.ग्रा; दवा प्रति लीटर पानी के घोल और कापर आक्‍सीक्‍लोराइड 0.2 (2 ग्राम प्रति लीटर ) पानी के घोल के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। इराके लिए 10 लीटर पानी में 1 ग्राम स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्‍लीन एवं 20 ग्राम कापर अक्‍सीक्‍लोराइड दवा का घोल बनाकर उपयोग कर सकते हैं।
5. गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों (जैसे बैतूल, छिंदवाडा, सिवनी) में गेरूआ के लिए सहनशील जातियां लगायें तथा रोग के प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही 1 मि.ली. प्रति लीटर की दर से हेक्‍साकोनाजोल 5 ई.सी. या प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. या आक्‍सीकार्बोजिम 10 ग्राम प्रति लीटर की दर से ट्रायएडिमीफान 25 डब्‍लू पी दवा के घोल का छिड़काव करें।
6. विषाणु जनित पीला मोजेक वायरस रोग व वड व्‍लाइट रोग प्राय: एफ्रिडस सफेद मक्‍खी, थ्रिप्‍स आदि द्वारा फैलते हैं अत: केवल रोग रहित स्‍वस्‍थ बीज का उपयोग करना चाहिए एवं रोग फैलाने वाले कीड़ों के लिए थायोमेथेक्‍जोन 70 डब्‍लू एव. से 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से उपचारित करें एवं 30 दिनों के अंतराल पर दोहराते रहें। रोगी पौधों को खेत से निकाल दें। इथोफेनप्राक्‍स 10 ई.सी. 1.0 लीटर प्रति हेक्‍टेयर थायोमिथेजेम 25 डब्‍लू जी, 1000 ग्राम प्रति हेक्‍टेयर।
7. पीला मोजेक प्रभावित क्षेत्रों में रोग के लिए ग्राही फसलों (मूंग, उड़द, बरबटी) की केवल प्रतिरोधी जातियां ही गर्मी के मौसम में लगायें तथा गर्मी की फसलों में सफेद मक्‍खी का नियमित नियंत्रण करें।
8. नीम की निम्‍बोली का अर्क डिफोलियेटर्स के नियंत्रण के लिए कारगर साबित हुआ है।
फसल कटाई एवं गहाई: अधिकांश पत्तियों के सूख कर झड़ जाने पर और 10 प्रतिशत फलियों के सूख कर भूरी हो जाने पर फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। पंजाब 1 पकने के 4–5 दिन बाद, जे.एस. 335, जे.एस. 76–205 एवं जे.एस. 72–44 जे.एस. 75–46 आदि सूखने के लगभग 10 दिन बाद चटकने लगती हैं। कटाई के बाद गडढ़ो को 2–3 दिन तक सुखाना चाहिए जब कटी फसल अच्‍छी तरह सूख जाये तो गहराई कर दोनों को अलग कर देना चाहिए। फसल गहाई थ्रेसर, ट्रेक्‍टर, बैलों तथा हाथ द्वारा लकड़ी से पीटकर करना चाहिए। जहां तक संभव हो बीज के लिए गहाई लकड़ी से पीट कर करना चाहिए, जिससे अंकुरण प्रभावित न हो।
अन्‍तर्वर्तीय फसल पद्धति: सोयाबीन के साथ अन्‍तर्वर्तीय फसलों के रूप में निम्‍नानुसार फसलों की खेती अवश्‍य करें।
1. अरहर + सोयाबीन (2:4)
2. ज्‍वार + सोयाबीन (2:2)
3. मक्‍का + सोयाबीन ( 2:2)
4. तिल + सोयाबीन (2:2)
अरहर एवं सोयाबीन में कतारों की दूरी 30 से.मी. रखें।

तिल

भारत वर्ष में उगायी जाने वाली तिलहनों में तिल एक अत्‍यंत महत्‍व की फसल है। इसके बीज में 50 से 54 प्रतिशत तेल, 16 से 19 प्रतिशत प्रोटीन एवं 15.6 से 17.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट की मात्रा पायी जाती है। तिल का तेल अत्‍यंत स्‍वादिष्‍ट एवं बहुउपयोगी होता है। भोजन पकाने के अलावा इसका उपयोग दवा , साबुन , बेकरी एवं सुगंधित तेल आदि में भी किया जाता है।
प्रदेश में इसकी औसत उपज 208 कि.ग्रा. प्रति हेक्‍टेयर है। इसकी खेती मुख्‍यत: छतरपुर, टीकमगढ, सिधि, शहडोल, मुरैना, शिवपुरी, सागर, दमोह, जबलपुर, मंउला, पूर्वी निमाड एवं सिवनी जिलों में की जाती है। उत्‍पादकों द्वारा सीमान्‍त एवं उपसीमान्‍त भूमि में वर्षा आधारित सीमित निवेश तथा कुप्रबंधन की स्थिति में काश्‍त करना ही फसल की कम उत्‍पादकता के प्रमुख कारण है। इसके अलावा प्रदेश के विभिन्‍न सस्‍य – जलवायु क्षेत्रों के लिये विकसित की गई उन्‍नत किस्‍मों का तथा सस्‍य उत्‍पादन तकनीक को अंगीकार करने से प्रदेश में तिल की उत्‍पादकता में सारगर्भित वृद्धि हुई है। प्रदेश हेतु विकसित की गई उन्‍नत तकनीक अपनाकर कृषक भाई अधिक उपज प्राप्‍त कर सकते हैं।
भूमि का चुनाव: फसल को प्रदेश की अधिकांश भूमि में उगाया जा सकता है। अच्‍छी जल निकास वाली हल्‍की से मध्‍यम गठी हुई मिटटी में फसल अच्‍छी होती है। बलुई दुमट मिटटी में पर्याप्‍त नमीं होने पर फसल बहुत अच्‍छी होती है। अम्‍लीय या क्षारीय भूमि तिल की काश्‍त हेतु अनुपयोगी होती है। काश्‍त करने हेतु भूमि का अनुकूलन पी.एच.मान 5.5 से 8.0 है।
भूमि की तैयारी: बीज के उचित अंकुरण एवं खेत में पर्याप्‍त पौध संख्‍या प्राप्‍त करने हेतु अच्‍छी तरह से गहरी जुताई एवं भुरभुरी मिटटी वाला खेत आवश्‍यक होता है। खेत में एक या दो बार हल तथा एक बार बखर चलाना चाहिये। पाटा चलाकर खेत को समतल करें। असमतल खेत में अनावश्‍यक पानी का जमाव होने से पौधे मर सकते हैं जिससे खेत में पौधों की संख्‍या कम हो सकती है तथा कम पौध संख्‍या का सीधा प्रभाव उपज पड़ता है तथा कम उपज प्राप्‍त होती है। अत: इस बात का विशेष ध्‍यान रखना चाहिये की खेत में अनावश्‍यक पानी का जमाव नहीं हो।
किस्‍मों का चुनाव: प्रदेश में काश्‍त हेतु निम्‍नलिखित उन्‍नत किस्‍मों को अनुशंसित किया गया है।
1. टी.के.जी.-21: ऑचलिक कृषि अनुसंधान केन्‍द्र, टीकमगढ (ज.ने.कृ.वि.वि. जबलपुर म.प्र.) द्वारा वर्ष 1992 में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दाने का रंग सफेद होकर सरकोस्‍पोरा पर्णदाग तथा जीवाणुचित्‍ती रोगों के प्रति रोधक किस्‍म है। 75-78 दिनों में पककर तैयार होती है तथा दानों में तेल की मात्रा 55.9 प्रतिशत होती है। उचित शस्‍य प्रबंधन के अंतर्गत औसत उपज 950 कि.ग्रा./हेक्‍टेयर प्राप्‍त होती है।
2. टी.के. जी.–22: टीकमगढ़ केन्‍द्र द्वारा वर्ष 1994 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानें सफेद रंग के होकर फाईटोफथेरा अंगमारी रोग रोधक किस्‍म है। परिपक्‍वता अवधि 76-81 दिन होकर दानों में 53.3 प्रतिशत तेल की मात्रा पायी जाती है। उत्‍तम शस्‍य प्रबंधन के द्वारा औसत उपज 950 कि.ग्रा./हे. प्राप्‍त होती है।
3. टी.के.जी.–55: यह किस्‍म भी टीकमगढ़ केन्‍द्र द्वारा वर्ष 1998 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। सफेद रंग के दानों वाली किस्‍म होकर फाईटोफथोरा अंगमारी एवं मेक्रोफोमिना तना एवं जड़ सडन बीमारी के लिये सहनशील है। 76 से 78 दिनों में पककर तैयार होती है। तेल की मात्रा 53 प्रतिशत पायी जाती है। औसत उपज क्षमता 630 कि.ग्रा. / हे. है।
4. टी.के.जी.–8: टीकमगढ़ केन्‍द्र द्वारा वर्ष 2000 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानों का रंग सफेद होता है। यह किस्‍म फाईटोफथोरा अंगमारी, आल्‍टरनेरिया पत्‍तीधब्‍बा तथा जीवाणु अंगमारी के प्रति सहनशील है। लगभग 86 दिनों में पक कर तैयार होती है। औसत उपज क्षमता 600 – 700 कि.ग्रा./हे. है।
5. कंचन तिल (जे.टी.-7): मध्‍य प्रदेश के सभी खरीफ तिल लेने वाले क्षेत्रों में जिसमें विशेषकर बुन्‍देलखंड क्षेत्र शामिल है के लिए उपयुक्‍त है। वर्ष 1981 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानों का रंग सफेद होकर आकार में बड़े होते हैं तथा तेल की मात्रा 54 प्रतिशत होती है। बहुशाखीय किस्‍म होने से इसकी औसत उपज क्षमता 880 कि.ग्रा./हे. है।
6. एन.-32: वर्ष 1970 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। सफेद चमकदार रंग के बीज एक तनेवाली (शाखा रहित) किस्‍म है। 90-100 दिनों में पककर तैयार होती है, तेल की मात्रा 53 प्रतिशत होकर औसत उपज क्षमता 770 कि.ग्रा./हे. है।
7. आर. टी.-46: यह किस्‍म सन 1989 में काश्‍त हेतु विमोचित हुई है। चारकोल विगलन रोग हेतु रोधक है। भूरे रंग का बीज होकर बीजों में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत होती है। किस्‍म लगभग 76–85 दिनों में पकती है तथा औसत उपज क्षमता 600–800 कि.ग्रा/हे. है।
8. रामा (इम्‍प्रुव्‍हट सिलेक्‍शन–5): यह किस्‍म सन 1989 में काश्‍त विमोचित हुई है। दानों का रंग लाल भूरा लाल होता है। दानों में तेल की मात्रा 45 प्रतिशत होती है तथा उचित शस्‍य प्रबंधन के अंतर्गत औसत उपज 700-1000 कि.ग्रा./हे. आती है।
9. उमा (ओ.एम.टी. 11-6-3): यह किस्‍म सन 1990 में काश्‍त हेतु विमोचित हुई है। जल्‍दी परिपक्‍व होने वाली (75–80 दिनों में) किस्‍म हैं। बीजों में तेल की मात्रा 51 प्रतिशत होकर औसत उपज क्षमता 603 कि.ग्रा./हे. है।
फसल चक्र: तिल जल्‍दी पकने वाली फसल होने के कारण एकल फसल अथवा कई फसल पद्धतियों में रबी या ग्रीष्‍म के लिये उपयुक्‍त है। प्रदेश में तिल उगाने वाले विभिन्‍न क्षेत्रों में साधारणत: ली जाने वाली क्रमिक फसल इस तरह है:-
धान - तिल
तिल - गेहूं
कपास और तिल - गेहूं
मिश्रित/अन्‍त: फसल पद्धति: तिल की एकल फसल उपज आय मिश्रित/अन्‍त: फसल से अधिक होती है। प्रदेश में ली जाने वाली कुछ लोकप्रिय मिश्रित/अन्‍त: फसल पद्धतियॉं इस प्रकार है:
तिल + मूंग (2:2 अथवा 3:3 )
तिल + उड़द (2:2 अथवा 3:3)
तिल + सोयाबीन ( 2:1 अथवा 2:2)
बीजोपचार: मृदा जन्‍य एवं बीजजन्‍य रोगों से बचाव के लिये बोनी पूर्व बीज को थायरस 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या थायरम (0.05 प्रतिशत) 1:1 से बीजोपचार करें। जहॉं पर जीवाणु पत्‍ती धब्‍बा रोग की संभावना होती है, वहॉ बोनी के पूर्ण बीजों को एग्रीमाइसीन– 100 के 0.025 प्रतिशत के घोल में आधा घंटे तक भिगोयें।
बोनी का समय: प्रदेश में फसल को मुख्‍यत: दो मौसम में उगाया जाता है जिनकी बोनी का समय निम्‍नानुसार है:
खरीफ : जुलाई माह का प्रथम सप्‍ताह
अर्द्ध रबी : अगस्‍त माह के अंतिम सप्‍ताह से सितंबर माह के प्रथम सप्‍ताह तक
ग्रीष्‍मकालीन : जनवरी माह के दूसरे सप्‍ताह से फरवरी माह के दूसरे सप्‍ताह तक
बोने की विधि: फसल को आमतौर पर छिटककर बोया जाता है जिसके फलस्‍वरूप निंदाई–गुडाई करने एवं अंर्त:क्रियायें करने में अत्‍यंत बाधा उत्‍पन्‍न होती है। फसल से अधिक उपज पाने के लिये कतारों में बोनी करनी चाहिये। छिटकवां विधि से बोनी करने पर बोनी हेतु 4 -7 कि;ग्रा./हे. बीज की आवश्‍यकता होती है। कतारों में बोनी करने हेतु यदि ड्रील का प्रयोग किया जाता है तो बीज दर घटाकर 2.5–3 किग्रा./हे. कर देना चाहिए। बोनी के समय बीजों का समान रूप से वितरण करने के लिए बीज को रेत (बालू) सुखी मिटटी या अच्‍छी तरह से सडी हुई गोबर की खाद के साथ 1:20 के अनुपात में मिलाकर बोना चाहिये। मिश्रित पद्धति में तिल की बीज दर 2.5 कि.ग्रा./हे. से अधिक नहीं होनी चाहिये। कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी 30 गुणा 10 सेमी. रखते हुए लगभग 3 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि: जमीन की उत्‍पादकता को बनाए रखने के लिये तथा अधिक उपज पाने के लिए भूमि की तैयारी करते समय अंतिम बखरनी के पहले 10 टन/हे. के मान से अच्‍छी सडी हुई गोबर की खाद को मिला देना चाहिये। वर्षा पर निर्भर स्थिति में 40:30:20 (नत्रजन:फास्‍फोरस:पोटाश) कि.ग्रा./हेक्‍टेयर की मान से देने हेतु सिफारिश की गई है। फास्‍फोरस एवं पोटाश की संपूर्ण मात्रा आधार खाद के रूप में तथा नत्रजन की आधी मात्रा के साथ मिलाकर बोनी के समय दी जानी चाहिये।
नत्रजन की शेष मात्रा पौधों में फूल निकलने के समय यानी बोनी के 30 दिन बाद दी जा सकती है। रबी मौसम में फसल में सिफारिश की गई उर्वरकों की संपूर्ण मात्रा आधार रूप में बोनी के समय दी जानी चाहिये। तिलहनी फसल होने के कारण मिटटी में गंधक तत्‍व की उपलब्‍धता फसल के उत्‍पादन एवं दानों में तेल के प्रतिशत को प्रभावित करती है। अत: फास्‍फोरस तत्‍व की पूर्ति सिंगल सुपर फास्‍फेट उर्वरक द्वारा करना चाहिये। भूमि परीक्षण के उपरांत जमीन में यदि गंधक तत्‍व की कमी पायी जाती है तो वहॉं पर जिंक सल्‍फेट 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्‍टेयर की दर से भूमि में तीन साल में एक बार अवश्‍य प्रयोग करें।
सिंचाई: खरीफ मौसम में फसल वर्षा आधारित होती है। अत: वर्षा की स्थिति, भूमि में नमी का स्‍तर, भूमि का प्रकार एवं फसल की मांग के अनुरूप सिंचाई की आवश्‍यकता भूमि में पर्याप्‍त नमीं बनाये रखने के लिये महत्‍वपूर्ण होता है। खेतों में एकदम प्रात: काल के समय पत्तियों का मुरझाना, सूखना एवं फूलों का न फूलना लक्ष्‍य दिखाई देने पर फसल में सिंचाई की आवश्‍यकता को दर्शाते हैं। अच्‍छी उपज के लिये सिंचाई की क्रांतिक अवस्‍थाये बोनी से पूर्व या बोनी के बाद, फूल आने की अवस्‍था है, अत: इन तीनों अवस्‍थाओं पर किसान भाई सिंचाई अवश्‍य करें।
निंदाई गुड़ाई: बोनी के 15-20 दिन बाद निंदाई एवं फसल में विरलीकरण की प्रक्रिया को पूरा कर लें। फसल में निंदा की तीव्रता को देखते हुये यदि आवश्‍यकता होने पर 15-20 दिन बाद पुन: निंदाई करें। कतारा में कोल्‍पा अथवा हैंड हो चलाकर नींदा नियंत्रित किया जा सकता है, कतारों के बीच स्थित निंदा निंदाई करते हुये नष्‍ट करना चाहिये। रासायनिक विधि से नींदा नियंत्रण हेतु ‘’लासो‘’ दानेदार 10 प्रतिशत को 20 कि.ग्रा./हे. के मान से बोनी के तुरंत बाद किन्‍तु अंकुरण के पूर्व नम भूमि में समान रूप से छिड़ककर देना चाहिये। एलाक्‍लोर 1.5 लीटर सक्रिय घटक का छिड़काव पानी में घोलकर बोनी के तुरंत बाद किन्‍तु अंकुरण के पूर्व करने से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।
पौध संरक्षण:
(अ) कीट: तिल की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में तिल की पत्‍ती मोडक फल्‍ली, छेदक , गाल फलाई , बिहार रोमिल इल्‍ली, तिल हॉक मॉथ आदि कीट प्रमुख है। इन कीटों के अतिरिक्‍त जैसिड़ तिल के पौधों में एक प्रमुख बीमारी पराभिस्‍तम्‍भ (पायलोडी) फैलने में भी सहायक होता है।
(1) गाल फ्लाई के मैगोट फूल के भीतर भाग को खाते हैं और फूल के आवश्‍यक अंगों को नष्‍ट कर पित्‍त बनाते हैं। कीट संक्रमण सितंबर माह में फलियॉ निकलते समय शुरू होकर नवंबर माह के अंत तक सक्रिय रहते हैं। नियंत्रण हेतु कलियॉं निकलते समय फसल पर 0.03 प्रतिशत, डाइमेथेएट या 0.06 प्रतिशत, इन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत, मोनोक्रोटोफॉस कीटनाशक दवाई को 650 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्‍टेयर की मात्रा से छिड़काव करें।
(2) तिल की पत्‍ती मोडक एवं फली छेदक इल्लियॉ प्रारंभिक अवस्‍था में पत्तियों को खाती है। फसल की अंतिम अवस्‍था में यह फूलों का भीतरी भाग खाती है। फसल पर पहली बार संक्रमण 15 दिन की अवस्‍था पर होता है तथा फसल वृद्धि के पूरे समय तक सक्रिय रहता है। इसे नियंत्रण करने के लिये इन्‍डोसल्‍फान 0.07 प्रतिशत अथवा क्विनॉलफॉन 0.05 प्रतिशत का 750 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हेक्‍टेयर की मान से फूल आने की अवस्‍था से आरंभ कर 15 दिनों के अंतराल से 3 बार छिड़काव करें।
(3) तिल हाक माथ इल्लियॉ पौधों की सभी पत्तियों को खाती हैं। इस कीट का संक्रमण कभी–कभी दिखाई देता है। फसल की पूरी अवस्‍था में कीट सक्रिय रहते हैं। नियंत्रण हेतु इल्लियों को हॉथ से निकालकर नष्‍ट करें। कार्बोरिल का 20 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर की दर से खड़ी फसल में भुरकाव करना चाहिये।
(4) बिहार रोमयुक्‍त इल्लियॉ लार्वा आरंभिक अवस्‍था में कुछ पौधों का अधिकांश भाग खाते हैं। परिपक्‍व इल्लियॉ दूसरे पौधों पर जाती हैं ओर तने को छोड़कर सभी भाग खाती हैं। इसका आक्रमण खरीफ फसल में उत्‍तरी भारत में सितंबर और अक्‍टूबर के आरंभ में अधिक होता है। नियंत्रित करने हेतु इन्‍डोसल्‍फान 0.07 प्रतिशत या मोनोक्रोटोफॉस 0.05 प्रतिशत का 750 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्‍टेयर के मान से छिड़काव करें।
(ब) रोग:
(1) फाइटोफथोरा अंगमारी: पत्तियों, तनों पर जलसिक्‍त धब्‍बे दिखाई देते हैं, इस स्‍थान पर सिंघाडे के रंग के धब्‍बे बनते हैं जो बाद में काले से पड़ जाते हैं। आर्द वातावरण में यह रोग तेजी से फैलता है जिससे पौधा झुलस जाता है एवं जड़ें सड़ जाती हैं।
(2) अल्‍टरनेरिया पर्णदाग: पत्तियों पर अनियंत्रित बैंगनी धब्‍बा तथा तने पर लग्‍बे बैंगनी धब्‍बे बनते हैं। रोग ग्रसित पत्तियॉ मुड जाती हैं।
(3) कोरिनोस्‍पोरा अंगमारी: पत्तियों पर अनियंत्रित बैंगनी धब्‍बा तथा तने पर लगते बैंगनी धब्‍बे बनते हैं। रोगग्रसित पत्तियॉं मुड़ जाती हैं।
(4) जड़ सडन: इस रोग में रोग्रसित पौधे की जड़ें तथा आधार से छिलका हटाने पर काले स्‍कलेरोशियम दिखते हैं जिनसे जड़ का रंग कोयले के समान धूसर काला दिखता है। रोग से संक्रमित जड़ को कम शक्ति लगाकर उखाड़ने पर कॉच के समान टूट जाती है। तने के सहारे जमीन की सतह पर सफेद फफूंद दिखाई देती है जिसमें राई के समान स्‍क्‍लेरोशिया होते हैं। इसके अलावा फ्युजेरियम सेलेनाई फफूंद के संक्रमित पौधों की जड़ें सिकुडी सी लालीमायुक्‍त होती हैं।
(5) शुकाणु अंगमारी: पत्तियों पर गहरे, भूरे रंग के काले अनियंत्रित धब्‍बे दिखते हैं जो आर्द एवं गरम वातावरण में तेजी से बढ़ने के कारण पत्‍ते गिर जाते हैं एवं तनों के संक्रमण में पौधा मर जाता है।
(6) शुकाणु पर्णदाग: पत्तियों पर गहरे भूरे कोंणीय धब्‍बे जिनके किनारे काले रंग के दिखाई देते हैं।
(7) भभूतिया रोग: पत्तियों पर श्‍वेत चूर्ण दिखता है तथा रोग की तीव्रता में तनों पर भी दिखता है एवं पत्तियॉ झड जाती हैं।
(8) फाइलोड़ी: रोग में सभी पुष्‍पीय भाग हरे रंग की पत्तियों के समान हो जाते हैं। पत्तियॉ छोटे गुच्‍छों में लगती हैं। रोग ग्रस्‍त पौधों में फल्लियॉ नहीं बनती हैं यदि बनती हैं तो उसमें बीज नहीं बनता है।
फसल कटाई: फसल की सभी फल्लियॉ प्राय: एक साथ नहीं पकती किंतु अधिकांश फल्लियों का रंग भूरा पीला पड़ने पर कटाई करनी चाहिये। फसल को गठ्ठे बनाकर रख देना चाहिये। सूखने पर फल्लियों के मुंह चटक कर खुल जायें तब इनको उलटा करके डंडों से पीटकर दाना अलग कर लिया जाता है। इसके पश्‍चात बीज को सुखाकर 9 प्रतिशत नमी शेष रहने पर भंडारण करना चाहिये।
उपज: उपरोक्‍तानुसार अच्‍छी तरह से फसल प्रबंधन होने पर तिल की सिंचित अवस्‍था में 1000-1200 कि.ग्रा./हे. और असिंचित अवस्‍था में उचित वर्षा होने पर 500–600 कि.ग्रा./हेक्‍टेयर उपज प्राप्‍त होती है।